देहरादून (बिलाल अंसारी) :-
उत्तराखंड राज्य ने आज अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। आज प्रदेश भर में इस उपलक्ष में खुशियां मनाई जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस उपलक्ष में राजधानी देहरादून पहुंचकर उत्तराखंड वासियों के साथ खुशियों में शरीक हुए हैं।
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने इन 25 वर्षों में कई उपलब्धियां हासिल कीं, तो वहीं कई चुनौतियों का सामना भी किया। पहाड़ों के विकास और लोगों के बेहतर जीवन की उम्मीदों के साथ बना उत्तराखंड आज आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है, कि आखिर इन 25 सालों में उसने क्या पाया और क्या खोया।

उत्तराखंड ने बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। राज्य के दुर्गम इलाकों तक सड़कें पहुंची हैं, बिजली और पानी की सुविधा पहले से बेहतर हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में नए विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थान और मेडिकल कॉलेज खुले हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार हुआ है, खासकर जिला अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाओं का विस्तार हुआ है।
राज्य की अर्थव्यवस्था में पर्यटन ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। चारधाम यात्रा, हिमालयी ट्रेकिंग रूट्स, योग नगरी ऋषिकेश और नैनीताल-मसूरी जैसे प्रसिद्ध स्थलों ने लाखों पर्यटकों को आकर्षित किया है। इससे रोजगार के अवसर बढ़े हैं और स्थानीय व्यापार को सहारा मिला है। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा और जलविद्युत उत्पादन के क्षेत्र में भी उत्तराखंड ने अपनी पहचान बनाई है।
हालांकि विकास की इस यात्रा में कई मुद्दे ऐसे भी हैं, जो आज भी चिंता का विषय बने हुए हैं। पलायन सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। रोजगार और शिक्षा की कमी के कारण हजारों परिवार पहाड़ छोड़कर मैदानों की ओर चले गए। सैकड़ों गांव आज पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
उत्तराखंड बनने का सबसे बड़ा उद्देश्य था पहाड़ों में रह रहे लोगों को उनके घरों के पास रोज़गार और सुविधाएं मिलें। लेकिन 25 साल बाद तस्वीर उलट है। सरकारी रिपोर्टों और सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार, आज राज्य के सैकड़ों गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। लोग रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मैदानों या अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
पलायन रोकने के नाम पर कई योजनाएं बनीं, लेकिन उनका प्रभाव ज़मीन पर बहुत सीमित रहा। स्थानीय उद्योग, हस्तशिल्प, कृषि आधारित रोजगार और पर्यटन को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिल पाया।
इसके अलावा, पर्यावरणीय असंतुलन भी एक गंभीर चुनौती बन गया है। जंगलों में आग, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं। अंधाधुंध निर्माण और खनन से नदियों व पहाड़ों की सेहत पर बुरा असर पड़ा है। जलवायु परिवर्तन के असर से पारंपरिक खेती और जल स्रोत भी प्रभावित हुए हैं।
आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को अपने युवाओं, पर्यावरण और पहाड़ी पहचान को केंद्र में रखकर एक संतुलित और टिकाऊ विकास मॉडल तैयार करना होगा। राज्य में शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी चिंता का विषय बन चुकी है। सरकारी भर्तियों में देरी, औद्योगिक निवेश की कमी और निजी क्षेत्र के सीमित अवसरों ने युवाओं को निराश किया है। अनेक बार नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे, जिससे युवाओं का भरोसा व्यवस्था पर कमज़ोर हुआ है।
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यही पहचान संकट में है। पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण, अवैध खनन और जंगलों में आग ने संतुलन बिगाड़ दिया है। हर साल सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो जाते हैं, नदियां गाद से भर रही हैं और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। विकास के नाम पर पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी ने राज्य की नाज़ुक पारिस्थितिकी को गहरी चोट पहुंचाई है।
इन समस्याओं की ज़िम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं है यह सामूहिक लापरवाही का परिणाम है। अब राज्य के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगले 25 वर्षों में वह अपने युवाओं और पहाड़ों को कैसे संवारता है। उत्तराखंड को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो गांवों को फिर से जीवंत करें, स्थानीय उत्पादों और हस्तशिल्प को बढ़ावा दें, और पर्यावरण संरक्षण को विकास का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
सरकारों ने योजनाएं तो बनाईं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर रहा। नौकरशाही में इच्छाशक्ति की कमी रही और नीति-निर्माण में पहाड़ की वास्तविक ज़रूरतें नज़रअंदाज़ होती रहीं। साथ ही, समाज और नागरिकों की भूमिका भी अहम है स्थानीय संसाधनों की रक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और स्वरोज़गार की दिशा में सामूहिक प्रयासों की कमी रही है।
उत्तराखंड का 25 वर्ष का सफर गौरव और सीख दोनों का प्रतीक है। इसने दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और संकल्प से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। लेकिन यह भी याद दिलाता है कि विकास तभी सार्थक है जब वह पर्यावरण और समाज दोनों के हित में हो।
अब वक्त है आत्ममंथन का। राज्य सरकार को चाहिए कि वह अपने युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की मजबूत नींव रखे। स्थानीय उत्पादों, जैविक खेती, पर्यटन और लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर ही पलायन रोका जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण को विकास की नीति का केंद्र बनाना होगा, तभी उत्तराखंड अपनी पहचान और स्थिरता दोनों को बनाए रख पाएगा।
