मस्जिदों की शहादत पर आंसू बहाने से पहले ढूंढने होंगे कुछ सवालों के जवाब : खुर्शीद अहमद सिद्दीकी

उत्तराखंड सरकार ने “लैंड जिहाद” और “डेमोग्राफिक बदलाव” के नाम पर सैकड़ों मज़ारें तोड़ दी हैं तथा लगभग 250 मदरसों को सील कर दिया है। इन मदरसों के नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) के लिए उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है और पुराने मदरसा बोर्ड को 01 जुलाई 2026 से समाप्त कर दिया गया है।इससे पहले एम.डी.डी.ए. कॉलोनी की मस्जिद को सील कर बंद किया गया था और वर्तमान में एम.डी.डी.ए. द्वारा थानो ग्राम की मस्जिद को अवैध बताकर सील कर दिया गया है।दोनों पक्षों द्वारा बयानबाज़ी और वीडियो प्रसारण खूब किए जा रहे हैं। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि कानून और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन हो रहा है तथा एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। इसी आधार पर अब उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की जा रही है।न्यायालय में मस्जिद की भूमि से संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत किए जाएंगे ताकि मालिकाना हक़ सिद्ध किया जा सके। इसके अतिरिक्त मस्जिद की इमारत की वैधता भी साबित करनी पड़ेगी।शरई दृष्टि से भी किसी मस्जिद की मिल्कियत और भूमि की स्थिति में कोई विवाद नहीं होना चाहिए। मस्जिद की जगह हर प्रकार के तनाज़े (विवाद) से पाक-साफ़ हो तथा वह पूर्ण रूप से अल्लाह के लिए वक़्फ़ की गई हो। मस्जिद की शरई हैसियत के लिए यह पहली और बुनियादी शर्त है।यदि इस शरई ज़िम्मेदारी का ध्यान रखा जाए तो मस्जिद को लेकर कानूनी विवाद उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम रह जाती है। लेकिन यदि इस मामले में लापरवाही बरती जाए, अपनी मनमानी की जाए और दस्तावेज़ों के अनुरूप कार्य न किया जाए, तो न्यायालय में मालिकाना हक़ साबित करना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि आज अनेक मुक़दमों में हमें प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

मस्जिदों, मदरसों और ख़ानकाहों के तहफ़्फ़ुज़ के लिए मुस्लिम उम्मत हर प्रकार की कुर्बानी देने को तैयार रहती है, लेकिन उनकी जायदादों के सही और मुकम्मल दस्तावेज़ सुरक्षित रखने के प्रति अक्सर गंभीरता नहीं दिखाई जाती। क्या शरीअत के स्पष्ट प्रावधानों को नज़रअंदाज़ करके हम अपनी मस्जिदों, मदरसों और ख़ानकाहों को सुरक्षित रख सकते हैं, जबकि शरीअत की पहली शर्त ही यह है कि उनकी मिल्कियत में किसी प्रकार का विवाद न हो?यह भी याद रखना चाहिए कि अपनी वैध मिल्कियत से अधिक नाजायज़ या घेरकर ली गई ज़मीन पर बनाई गई मस्जिद में नमाज़ की शरई स्थिति भी प्रश्नों के घेरे में आ सकती है।आज ही के दिन जिला गाजियाबाद के कल्लू गढ़ इलाके में एक बड़े मदरसे पर जोकि अफसरान द्वारा सरकारी जमीन पर निर्मित बताया जा रहा है और उसकी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई चल रही है। अब सवाल यह है कि किस तरह सरकारी ज़मीन या घेरी हुई जमीन पर शरीयत के खिलाफ इन दीनदार उलेमा के जरिये मस्जिद/मदरसे बना दिए जाते हैं जो अब मिल्कियत और कागज़ी कमी की वजह से अब टूट रहे है तो इसका कानूनी तौर से जिम्मेदार कौन है? पहली बात ऐसे मदरसों में उम्मत मुस्लिमा क्यों अपनी ज़कात और सदक़ात देती है जिनका हश्र यह होता हैं। दूसरी बात जिस काम के लिए आपकी शरीअत ही इजाज़त नहीं देती उसको दीन का लिबादा पहना कर तमाम मुस्लिम समाज को क्यों बदनाम करने का कारण बन रहे हो इसका एहतेसाब करने की जरूरत है नहीं तो आखिरत में हिसाब देना होगा।इसलिए वर्तमान हालात से सबक लेने और शरीअत-ए-मुहम्मदी के प्रत्येक प्रावधान पर अमल करने की आवश्यकता है। जब साँप निकल जाता है तो लाठी पीटने से कोई लाभ नहीं होता। समय रहते स्वयं को शरीअत का पाबंद बना लेने में ही दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई और सुरक्षा है।