
देहरादून –
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनावों की सियासी बिसात बिछने लगी है। भाजपा और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण बनाने में जुट गए हैं। आने वाले दिनों में उम्मीदवार सामने आएंगे, टिकट बांटे जाएंगे, चुनावी वादे होंगे और हमेशा की तरह मुस्लिम मतदाताओं को भी साधने की कोशिश की जाएगी।
लेकिन इस बार उत्तराखंड के राजनीतिक दल एक बात अच्छी तरह समझ लें—
अब मुस्लिम वोट की सियासत का पैमाना बदल चुका है।
अब हम किसी को सिर्फ हराने के लिए वोट नहीं करेंगे।
अब हम डरकर या भावनाओं में बहकर वोट नहीं करेंगे।
अब हमारा वोट हमारे बच्चों के मुस्तकबिल के लिए होगा। हमारे नौजवानों की तालीम और रोजगार के लिए होगा। हमारे कारोबार और आर्थिक तरक्की के लिए होगा। संविधान की मान्यताओं और बराबरी के अधिकार के लिए होगा। उत्तराखंड और मुल्क के बेहतर भविष्य के लिए होगा।
अब वोट नकारात्मकता पर नहीं—प्रोग्राम पर होगा।
हमें यह मत बताइए कि किससे डरना है, यह बताइए कि आप हमारे लिए क्या करेंगे ?
अब वह दौर गुजर जाना चाहिए जब चुनाव आते ही मुसलमानों को सिर्फ यह बताया जाता था कि अगर फलां पार्टी जीत गई तो क्या होगा।
अब सवाल बदल चुका है।
हमें यह मत बताइए कि हमें किससे डरना चाहिए। हमें यह बताइए कि अगर आप जीतेंगे तो हमारे लिए क्या करेंगे?
हमारे बच्चों को बेहतर तालीम कैसे मिलेगी?
हमारे नौजवानों के लिए रोजगार के नए मौके कैसे पैदा होंगे?
छोटे कारोबारियों, दस्तकारों और स्वरोजगार करने वालों को आगे बढ़ाने के लिए आपका प्रोग्राम क्या है?
मुस्लिम बहुल पिछड़े इलाकों में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाएं कैसे बेहतर होंगी?
सरकारी योजनाओं का फायदा बिना किसी धार्मिक भेदभाव के हर जरूरतमंद तक कैसे पहुंचेगा?
और सबसे अहम—क्या आप संविधान के दायरे में हर नागरिक की बराबरी, सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के लिए खुलकर खड़े होंगे?
2027 में वोट इन्हीं सवालों के जवाब पर तय होगा।
उत्तराखंड में वोट चाहिए तो हिस्सेदारी और विकास का हिसाब भी देना होगा
उत्तराखंड के मैदानी इलाकों, खासकर हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल के कई विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए कांग्रेस समेत हर उस राजनीतिक दल को, जो मुस्लिम वोट की उम्मीद करता है, अब यह समझ लेना चाहिए कि सिर्फ चुनाव के वक्त मुस्लिम समाज को याद करना पर्याप्त नहीं होगा।
अब सवाल होगा—
अगर हमारा वोट आपकी जीत में हिस्सेदार है तो आपकी सत्ता और फैसलों में हमारी हिस्सेदारी कहां है?
अगर मुस्लिम कार्यकर्ता पार्टी के लिए वर्षों तक मेहनत करता है तो उसकी भूमिका सिर्फ भीड़ जुटाने, नारे लगाने, पोस्टर लगाने और दरी बिछाने तक क्यों सीमित रहे?
अगर मुसलमान उत्तराखंड का बराबर का नागरिक है तो उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी सिर्फ हज कमेटी, वक्फ बोर्ड और अल्पसंख्यकों से जुड़ी संस्थाओं तक ही क्यों दिखाई दे?
मुसलमान शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार और विकास की मुख्यधारा में भी बराबर का हिस्सेदार है।
इसलिए अब वोट चाहिए तो नुमाइंदगी भी देनी होगी, सम्मान भी देना होगा और विकास का ठोस रोडमैप भी सामने रखना होगा।
अब मुस्लिम उम्मीदवार होना ही काफी नहीं
यह पैगाम सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए नहीं, मुस्लिम नेताओं के लिए भी है। 2027 में सिर्फ मुस्लिम नाम और पहचान टिकट या वोट की गारंटी नहीं होगी। अगर कोई मुस्लिम उम्मीदवार है तो उससे भी वही सवाल होंगे जो किसी गैर-मुस्लिम उम्मीदवार से होंगे—
आपके पास विकास का क्या विजन है?
आप नौजवानों के रोजगार के लिए क्या करेंगे?
आप शिक्षा के लिए क्या करेंगे?
आप अपने विधानसभा क्षेत्र के पिछड़े इलाकों को आगे कैसे बढ़ाएंगे?
आप विधानसभा में जनता के सवाल कितनी मजबूती से उठाएंगे?
क्योंकि अब फैसला सिर्फ उम्मीदवार के नाम, धर्म या पार्टी देखकर नहीं होगा। अब वोट उम्मीदवार के काम, किरदार, विजन और प्रोग्राम को देखकर होगा। और अगर कोई गैर-मुस्लिम उम्मीदवार संविधान की मर्यादा में रहकर बिना भेदभाव सबके विकास, सबके अधिकार और सबके सम्मान की बात करता है, तो उसकी बात भी सुनी जाएगी। कसौटी सबके लिए एक होगी।
‘भाजपा हराओ’ अब हमारा अकेला सियासी एजेंडा नहीं।
उत्तराखंड के राजनीतिक दल यह बात भी समझ लें कि भाजपा को हराने की जिम्मेदारी सिर्फ मुसलमानों की नहीं है। अगर कांग्रेस या कोई दूसरा राजनीतिक दल भाजपा का राजनीतिक और वैचारिक मुकाबला करना चाहता है तो वह जनता के बीच जाए, अपना संगठन मजबूत करे, अपनी नीतियां सामने रखे और उत्तराखंड के हर वर्ग का भरोसा हासिल करे। मुसलमान को सिर्फ यह कहकर वोट देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि अगर आपने हमें वोट नहीं दिया तो भाजपा जीत जाएगी। भाजपा को हराना आपकी राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन हमारा सियासी एजेंडा अब अपने बच्चों का मुस्तकबिल जिताना है।
हमारी तालीम जीते।
हमारा रोजगार जीते।
हमारा कारोबार जीते।
हमारे गांव और शहर का विकास जीते।
संविधान और बराबरी की सोच जीते।
उत्तराखंड की तरक्की जीते।
और आखिर में—हमारा मुल्क जीते।
यही अब हमारे वोट का मकसद होगा।
2027 का फैसला—भावनाओं पर नहीं, कार्यक्रम पर वोट
उत्तराखंड के राजनीतिक दलों तक यह पैगाम अभी से पहुंच जाना चाहिए कि 2027 में मुस्लिम मतदाता को किसी पार्टी का बंधुआ वोटर समझने की भूल न की जाए।
अब चुनाव के वक्त सिर्फ डर दिखाकर वोट हासिल नहीं होगा। सिर्फ बड़े-बड़े सेकुलर नारों से वोट नहीं होगा। सिर्फ धार्मिक पहचान देखकर वोट नहीं होगा। सिर्फ यह देखकर वोट नहीं होगा कि कौन किसे हरा सकता है। अब वोट कार्यक्रम पर होगा। जो बेहतर तालीम का प्रोग्राम देगा—उसकी बात सुनी जाएगी। जो रोजगार और कारोबार का रोडमैप देगा—उसकी बात सुनी जाएगी। जो उत्तराखंड के विकास का विजन देगा—उसकी बात सुनी जाएगी। जो संविधान की मान्यताओं, बराबरी और बिना भेदभाव के शासन की बात करेगा—उसकी बात सुनी जाएगी। जो हिंदू-मुसलमान और पहाड़-मैदान के नाम पर उत्तराखंड को बांटने के बजाय हर उत्तराखंडी को साथ लेकर आगे बढ़ने की बात करेगा—उसकी बात सुनी जाएगी। और जो इन कसौटियों पर खरा उतरेगा, वोट उसी को मिलेगा।
उत्तराखंड के राजनीतिक दल सुन लें—अब एजेंडा हम तय करेंगे
2027 के लिए पैगाम साफ है—
हम किसी को हराने के लिए वोट नहीं करेंगे—हम अपना मुस्तकबिल जिताने के लिए वोट करेंगे।
खौफ पर नहीं—विकास पर वोट होगा।
जज़्बात पर नहीं—प्रोग्राम पर वोट होगा।
नफरत पर नहीं—रोजगार पर वोट होगा।
खाली नारों पर नहीं—तालीम और तरक्की पर वोट होगा।
धार्मिक पहचान पर नहीं—काम और किरदार पर वोट होगा।
भेदभाव पर नहीं—संविधान और बराबरी पर वोट होगा।
और सबसे बढ़कर—
वोट हमारे बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए होगा।
वोट उत्तराखंड की खुशहाली के लिए होगा।
वोट मुल्क की तरक्की और संविधान की हिफाजत के लिए होगा।
2027 में सवाल यह नहीं होगा कि किसको हराना है।
अब सवाल सिर्फ यह होगा—
हमारे बच्चों का मुस्तकबिल कौन बेहतर बनाएगा?
उत्तराखंड को आगे कौन ले जाएगा?
संविधान और बराबरी के रास्ते पर कौन चलेगा?
जो इसका सबसे बेहतर जवाब और भरोसेमंद प्रोग्राम लेकर आएगा—वोट उसी का होगा।
यह सुझाव नहीं, 2027 के लिए हमारी नई सियासी सोच का ऐलान है।
