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न बिरादरी पर गुरूर, न बिरादरी के वजूद से इनकार, अल्लाह ने कबीले पहचान के लिए बनाए, बरतरी और कमतरी के लिए नहीं

Byadmin

October 9, 2026

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न बिरादरी पर गुरूर, न बिरादरी के वजूद से इनकार

अल्लाह ने कबीले पहचान के लिए बनाए, बरतरी और कमतरी के लिए नहीं

डॉ जमशेद उस्मानी

     आज जब मुस्लिम समाज में बिरादरी, क़बीले, नसब और “पसमांदा” जैसे अल्फ़ाज़ को लेकर बहस तेज़ है, तब ज़रूरत है कि इस मसले को सियासी नारों से नहीं बल्कि क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में समझा जाए।

इस्लाम ने इंसान को उसकी पैदाइश, नसब, ख़ानदान या बिरादरी की वजह से न तो किसी दूसरे इंसान से ऊंचा बनाया और न किसी को नीचा।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि इस्लाम ने ख़ानदान, बिरादरी, क़बीले और नसब की पहचान को ही ख़त्म कर दिया।

क़ुरआन का संदेश दोनों अतियों के बीच है।

एक तरफ़ बिरादरी और क़बीले के नाम पर घमंड, तकब्बुर और दूसरों की तज़लील गलत है; दूसरी तरफ़ यह कहना भी क़ुरआन के स्पष्ट बयान से मेल नहीं खाता कि इंसानों की कोई क़बीलाई या ख़ानदानी पहचान होती ही नहीं।

क़ुरआन ने साफ़ कहा: हमने तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में बनाया

अल्लाह तआला सूरह अल-हुजुरात में फ़रमाता है:

“या अय्युहन-नासु इन्ना ख़लक़नाकुम मिन ज़करिं व उन्सा व जअल्नाकुम शुऊबं व क़बाइला लितआरफ़ू, इन्ना अकरमकुम इन्दल्लाहि अतक़ाकुम।”

तर्जुमा:
“ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो तुममें सबसे ज़्यादा तक़वा वाला है।” (सूरह अल-हुजुरात, 49:13)

इस आयत में दो बातें एक साथ बयान हुई हैं।

पहली:

“व जअल्नाकुम शुऊबं व क़बाइला”

यानी अल्लाह ने इंसानों को अलग-अलग क़ौमों और क़बीलों में बनाया।

दूसरी:

“लितआरफ़ू”

यानी इसका उद्देश्य यह है कि तुम एक-दूसरे को पहचानो।

इसलिए बिरादरी और क़बीले का वजूद क़ुरआन में मौजूद है और उसकी पहचान को क़ुरआन ने स्वीकार किया है।

तफ़्सीर इब्ने कसीर में भी “शुऊब” और “क़बाइल” की विभिन्न सामाजिक-नसबी श्रेणियों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया गया है कि इंसानों की नसबी हैसियत में मूलतः बराबरी है और असली फ़ज़ीलत धार्मिक आचरण और तक़वा से है।

बिरादरी का वजूद मानना और बिरादरी पर घमंड करना दो अलग बातें हैं

यह फ़र्क़ समझना आज बहुत ज़रूरी है।

अगर कोई व्यक्ति कहता है:

“मैं फलां बिरादरी से ताल्लुक़ रखता हूँ।”

तो यह एक सामाजिक और ख़ानदानी पहचान है।

लेकिन अगर वह कहता है:

“मैं फलां बिरादरी से हूँ, इसलिए मैं तुमसे बेहतर हूँ।”

तो यह घमंड और नसबी बरतरी का दावा है।

पहली चीज़ तआरुफ़ है।

दूसरी चीज़ तकब्बुर है।

क़ुरआन ने पहली चीज़ को स्वीकार किया और दूसरी चीज़ के लिए कोई आधार नहीं दिया।

बल्कि उसी आयत में फ़ैसला कर दिया:

“इन्ना अकरमकुम इन्दल्लाहि अतक़ाकुम।”

यानी अल्लाह के नज़दीक इज़्ज़त का पैमाना तक़वा है।

लेकिन एक दूसरी अतिशयोक्ति भी है

कुछ लोग बिरादरीवाद की बुराइयों को देखकर इस हद तक चले जाते हैं कि कहते हैं:

“इस्लाम में कोई बिरादरी नहीं, कोई क़बीला नहीं, कोई नसब नहीं।”

यह बात भी सही नहीं है।

क्योंकि अगर क़ुरआन में “शुऊब” और “क़बाइल” के अल्फ़ाज़ मौजूद हैं और उनके उद्देश्य के लिए “लितआरफ़ू” कहा गया है, तो क़ुरआनी दृष्टिकोण यह नहीं हो सकता कि इंसानी ख़ानदानी और क़बीलाई पहचान का कोई वजूद ही नहीं।

बिरादरी को मिटाना इस्लाम का मक़सद नहीं; बिरादरी को तकब्बुर का ज़रिया बनने से रोकना इस्लाम का मक़सद है।

यही फ़र्क़ समझने की ज़रूरत है।

पहचान को मिटाना नहीं, पहचान को सही मक़ाम देना है

इस्लाम का संदेश यह नहीं है कि इंसान अपने ख़ानदान का नाम भूल जाए।

बल्कि रिश्तेदारी और सिलह-रहमी की पूरी इस्लामी व्यवस्था इस बात को मानती है कि इंसान के रिश्ते और नसब की पहचान होती है।

इसलिए सही रवैया यह है:

अपनी बिरादरी पहचानो, लेकिन उस पर घमंड मत करो।

अपने नसब को जानो, लेकिन किसी दूसरे नसब को नीचा मत समझो।

अपने क़बीले से मोहब्बत रखो, लेकिन दूसरे क़बीले से नफ़रत मत करो।

अपनी पहचान पर क़ायम रहो, लेकिन उसे इंसानी बरतरी का प्रमाण मत बनाओ।

अब सवाल आता है “पसमांदा” का

“पसमांदा” शब्द आम तौर पर उन लोगों या तबक़ों के लिए इस्तेमाल होता है जिन्हें सामाजिक, आर्थिक या शैक्षिक रूप से पीछे रह जाने वाला या हाशिये पर मौजूद समझा जाता है।

अगर कोई व्यक्ति सामाजिक या आर्थिक रूप से पीछे रह गया है, तो उसकी हालत को बेहतर करना, उसके बच्चों को शिक्षा दिलाना, रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराना और उसे बराबर सामाजिक अवसर देना निश्चित रूप से एक सकारात्मक सामाजिक उद्देश्य हो सकता है।

इस्लाम किसी वास्तविक महरूमी को छिपाने की शिक्षा नहीं देता।

अगर कोई ग़रीब है तो उसकी मदद होनी चाहिए।

अगर कोई शिक्षा से वंचित है तो उसे शिक्षा मिलनी चाहिए।

अगर किसी समूह को अवसरों की कमी का सामना है तो उसके लिए अवसर पैदा किए जाने चाहिए।

अगर किसी व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है तो उसके साथ इंसाफ़ होना चाहिए।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल पैदा होता है:

क्या सामाजिक या आर्थिक पिछड़ापन किसी पूरी बिरादरी की पैदाइशी पहचान बन सकता है?

क़ुरआन के बताए सिद्धांतों की रोशनी में इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

“पिछड़ापन” एक सामाजिक स्थिति हो सकती है, नसबी पहचान नहीं

किसी व्यक्ति या परिवार का आर्थिक रूप से कमज़ोर होना एक हालत है।

किसी बच्चे का शिक्षा से वंचित रह जाना एक सामाजिक समस्या है।

किसी क्षेत्र का विकास में पीछे रह जाना एक प्रशासनिक समस्या है।

लेकिन इन समस्याओं को किसी पूरी बिरादरी की स्थायी और पैदाइशी पहचान बना देना एक अलग मामला है।

क्योंकि आज जो व्यक्ति ग़रीब है, उसका बेटा कल डॉक्टर हो सकता है।

आज जो परिवार शिक्षा से वंचित है, उसकी अगली नस्ल विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर हो सकती है।

आज जो व्यक्ति रोज़गार की तलाश में है, वह कल एक बड़ा कारोबारी हो सकता है।

तो फिर उसकी पूरी बिरादरी को हमेशा के लिए “पसमांदा” कह देना किस हद तक इंसानी गरिमा और आत्मसम्मान के अनुकूल है?

महरूमी को दूर करना ज़रूरी है; महरूमी को पहचान बना देना ज़रूरी नहीं।

इस्लाम हीन भावना नहीं, ख़ुद्दारी सिखाता है

इस्लाम ने मुसलमान को यह नहीं सिखाया कि वह अपनी पैदाइश की वजह से अपने आपको कमतर समझे।

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि मुसलमान अपने दूसरे मुसलमान भाई को न तो ज़ुल्म करता है, न उसे बे-सहारा छोड़ता है और न उसे हक़ीर समझता है। फिर आपने सीने की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया:

“तक़वा यहां है।”

और आपने स्पष्ट किया कि किसी मुसलमान भाई को हक़ीर समझना अपने आप में गंभीर बुराई है।

(सहीह मुस्लिम, 2564)

यह हदीस केवल “ऊंची” समझी जाने वाली बिरादरियों के लिए संदेश नहीं है।

यह हर मुसलमान के लिए है।

इसमें एक तरफ़ यह चेतावनी है कि कोई किसी दूसरे को नीचा न समझे, और दूसरी तरफ़ यह संदेश भी है कि इंसान अपनी पैदाइश को अपनी कमतरी की वजह न समझे।

न कोई पैदाइशी तौर पर बड़ा, न कोई पैदाइशी तौर पर छोटा

क़ुरआन का फ़ैसला बिल्कुल साफ़ है:

सब इंसान एक मर्द और एक औरत से पैदा हुए।

इसलिए किसी को केवल नसब की वजह से अल्लाह के सामने श्रेष्ठ होने का दावा हासिल नहीं हो जाता।

इसी तरह किसी को केवल अपनी बिरादरी के नाम की वजह से अपने आपको हीन समझने की भी आवश्यकता नहीं।

इज़्ज़त का पैमाना तक़वा है।

यही इस्लामी आत्मसम्मान है।

“पसमांदा” की बहस में असली सवाल

इसलिए जब “पसमांदा” की बात हो तो बहस को दो अलग हिस्सों में समझना चाहिए।

पहला — वास्तविक सामाजिक समस्या

क्या किसी समुदाय में शिक्षा की कमी है?

क्या आर्थिक अवसर कम हैं?

क्या बेरोज़गारी अधिक है?

क्या सरकारी योजनाओं तक पहुंच कम है?

क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी है?

अगर हाँ, तो इन समस्याओं का समाधान होना चाहिए।

दूसरा — स्थायी सामाजिक लेबल

क्या किसी पूरी बिरादरी को केवल उसकी पैदाइश के कारण हमेशा के लिए “पिछड़ा” मान लिया जाए?

क्या उसके बच्चों को भी उसी पहचान में बांध दिया जाए?

क्या उसकी उपलब्धियों के बावजूद उसे उसी श्रेणी में देखा जाए?

क्या इससे उसके अंदर हीन भावना पैदा हो सकती है?

इन सवालों पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

इस्लाम इंसान की समस्या का समाधान चाहता है, इंसान को समस्या की पहचान बना देना नहीं।

सियासत को इंसान की हालत सुधारनी चाहिए, पहचान को हथियार नहीं बनाना चाहिए

सियासत में अलग-अलग सामाजिक समूहों की समस्याओं को उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। लेकिन किसी भी सामाजिक पहचान को इस तरह इस्तेमाल करना कि समाज के लोग एक-दूसरे को ऊंचा-नीचा समझने लगें, मुस्लिम समाज के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

मुस्लिम समाज को सवाल करना चाहिए:

क्या हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल रही है?

क्या हमारे नौजवानों को रोज़गार मिल रहा है?

क्या छोटे कारोबारियों को अवसर मिल रहे हैं?

क्या गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता मिल रही है?

क्या महिलाओं और युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं?

क्या हर नागरिक को न्याय और समान अवसर मिल रहे हैं?

बहस इन वास्तविक मुद्दों पर होनी चाहिए।

किसी की बिरादरी को उसके सम्मान का पर्याय भी न बनाया जाए और उसकी कमतरी का प्रमाण भी न बनाया जाए।

दो इंतहायों से बचना होगा

आज मुस्लिम समाज को दो अतियों से बचने की ज़रूरत है।

पहली इंतहा:

“मेरी बिरादरी सबसे ऊंची है।”

यह सोच क़ुरआन के उसूल के खिलाफ़ है, क्योंकि अल्लाह ने तक़वा को असली फ़ज़ीलत बताया।

दूसरी इंतहा:

“बरादरी या क़बीला नाम की कोई चीज़ ही नहीं है।”

यह भी क़ुरआन के स्पष्ट बयान के अनुरूप नहीं, क्योंकि अल्लाह ने स्वयं “शुऊबं व क़बाइला” का उल्लेख किया और उनके उद्देश्य को “लितआरफ़ू” बताया।

इसलिए सही इस्लामी रास्ता बीच का है:

पहचान को स्वीकार करो, मगर पहचान पर घमंड मत करो।

नसब को जानो, मगर नसब को बरतरी का प्रमाण मत बनाओ।

अपनी बिरादरी का सम्मान करो, मगर दूसरी बिरादरी की तज़लील मत करो।

किसी सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करो, मगर किसी इंसान को पैदाइशी तौर पर कमतर मत बनाओ।

क़ुरआन का पैग़ाम: “लितआरफ़ू” — पहचानो, बांटो मत

क़ुरआन ने नहीं कहा:

लितफ़ख़रू — ताकि तुम एक-दूसरे पर फ़ख़्र करो।

नहीं।

कहा:

लितआरफ़ू — ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।

यानी पहचान का मक़सद तआरुफ़ है, तकब्बुर नहीं।

बिरादरी का मक़सद रिश्तों और पहचान को समझना है, इंसानों की दर्जाबंदी करना नहीं।

क़बीला सामाजिक पहचान हो सकता है, मगर अल्लाह के यहां इंसान की अंतिम क़ीमत का पैमाना नहीं।

मुस्लिम समाज को आज इस पूरे मसले पर एक संतुलित और क़ुरआनी सोच अपनाने की ज़रूरत है।

जो अपनी बिरादरी के नाम पर दूसरे को नीचा समझता है, वह ग़लत है।

जो अपनी बिरादरी के नाम पर खुद को दूसरों से बेहतर समझता है, वह भी ग़लत है।

जो सामाजिक और आर्थिक महरूमी को दूर करने की कोशिश करता है, उसकी कोशिश को समझना चाहिए।

लेकिन किसी बिरादरी को उसकी पैदाइश के कारण स्थायी रूप से कमतर समझना या “पिछड़ा” होने को उसकी नसबी पहचान बना देना भी इस्लामी इंसानी गरिमा के साथ संगत नहीं।

और इसी तरह:

बिरादरी के नाम पर घमंड ग़लत है, लेकिन बिरादरी और क़बीले के अस्तित्व से इनकार भी क़ुरआन के स्पष्ट शब्दों के विपरीत है।

क़ुरआन ने दोनों बातें एक साथ रख दीं:

“व जअल्नाकुम शुऊबं व क़बाइला लितआरफ़ू”
— हमने तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।

और फिर:

“इन्ना अकरमकुम इन्दल्लाहि अतक़ाकुम”
— अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे अधिक इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे अधिक मुत्तक़ी है।

यही इस्लाम का संतुलन है।

बिरादरी रहे—मगर बिरादरीवाद न रहे।
नसब रहे—मगर नसबी घमंड न रहे।
पहचान रहे—मगर पहचान की लड़ाई न रहे।
महरूमी दूर हो—मगर महरूमी इंसान की स्थायी पहचान न बने।
और सबसे बढ़कर—इंसान की इज़्ज़त उसकी पैदाइश से नहीं, उसके किरदार और तक़वा से हो।

क़ुरआन ने पहचान मिटाने का नहीं, पहचान को सही मक़ाम देने का रास्ता दिखाया है।

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